उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिंद महासागर के बीच आती है देश के संस्कृति की सबसे अच्छी रक्षक ज़मीन ‘बंगाल’।
बंगाल की अपनी एक संस्कृति रही है, बंगाल ने हमेशा उसकी रक्षा की है।
सबसे अच्छी खूबी यह है कि बंगाल ने हमेशा सुधारो का स्वागत किया है जब सारे हिन्दू धर्म में रूढ़िवाद का प्रभुत्व बढ़ रहा था तब बंगाल में चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति की कृष्ण धारा का प्रवाह इस क्षेत्र में किया।
बंगाल की धरती सबसे पहले अंग्रेजों के संपर्क में आयी, परंतु फिर भी उसने अपने जड़ों को नहीं छोड़ा।
चैतन्य महाप्रभु की विरासत को राजा राममोहन राय और ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे महापुरुषों ने आगे बढ़ायाइनकी विरासत को आगे बढ़ाने आए रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद।
राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिए लड़े गए संघर्ष में बंगाल के लोग शुरू से आगे रहे थे, कांग्रेस के शुरुआती नेता जैसे–सुरेंद्र नाथ बनर्जी, बिपिन चंद्र पाल आदि।
जहां एक और गर्मदल के नेता थे तो वहीं व्यक्ति की स्वतंत्रता पर बल देने वाले स्वदेशी आंदोलन का विरोध करने वाले एशिया के पहले ‘नोबेल’ विजेता भी बंगाल से थे।
क्रांतिकारियों का गढ़ या यूं कहे उद्गम भी बंगाल से ही हुआ था। बंगाल की जमी ने ऐसे कई जवान पैदा किए जो आज गुमनामी में है जिनके कारण आज हम देश का झंडा बुलंद कर रहे है। सचिंद्र सान्याल, खुदीराम बोस, प्रफुल चाकी, तारक दास और चिटगांव के वो तमाम योद्धा जिन्होंने ब्रितानिया हुकूमत को चुनौती दी थी।
अब एक और बंगाल के सपूत की बात करना आवश्यक है वो है सुभाष बाबू, महात्मा के सिपाही नेहरू के मित्र।बंगाल को सबसे ज्यादा दुख 14 अगस्त को हुआ होगा जब उसे धर्म के आधार पर बांटा पर बंगाल न दिल्ली हुकूमत को स्वीकार करता है और ना ही विभाजन को बंगाल हमेशा से खुले विचारों की शरण स्थली रहा है बंगाल आजाद रहा है।
