
मुंडाओ ने हमेशा से ‘दिकुओ’ को चुनौती दी है। ब्रितानी हुकूमत के विरुद्ध बिरसा मुंडा के उलगुलान की विरासत को आगे बढ़ाते है –मरांग गोमके जयपाल मुंडा।
1927 में बने पहले आदिवासी आईसीएस अधिकारी 1928 में भारत के हॉकी कैप्टन बन जाते है। हमेशा जितने वाला यह आदिवासी भारत के लिए गोल्ड मेडल लेकर आता है। फिर अपनी विरासत को संभालते हैं, आदिवासियों के हक की बात शुरू करते है।
जब देश ‘नियति के साथ वायदा’ कर रहा था तभी जयपाल मुंडा ‘देस’ के 7 प्रतिशत आबादी के 4 सदस्यों के साथ भारतवासियों को संबोधित कर रहे थे।
संविधान सभा में जयपाल मुंडा द्वारा आदिवासियों के लिए एक मजबूत पक्ष रखा जिसका परिणाम आदिवासियों के लिए आरक्षण सहित संविधान का 5 भाग है।
जयपाल ने राष्ट्र के एकीकरण में भी प्रमुख भूमिका निभाई थी। एक बार नागा प्रतिनिधिमंडल जब उनसे मिलने आया तब उन्होंने कहा था कि हम अपनी संस्कृति को बचाने के लिए कुछ रिहायत मांगेंगे जो हमारा हक भी है, पर हम अलग राष्ट्र की बात नहीं करेंगे। सभी आदिवासियो को भारत को मजबूत करने हेतु प्रेरित किया।
उस समय कई लोग ‘भाषा के आधार’ पर‘ राज्य के निर्माण’ को लेकर उग्र थे परंतु ‘मुंडा’ ने अपनी संस्कृति और प्रकृति की रक्षा के लिए झारखंड के निर्माण की मांग उठाई। जल, जंगल और जमीन का नारा और बुलंद किया।
20 मार्च 1970 में उनकी मृत्यु हो जाती है उनका सपना अभी भी अधूरा था, आदिवासियो के पास अपना राज्य नहीं था, मुंडा के शब्दों में कहें तो ब्रितानी हुकूमत की जगह बिहारी साम्राज्य था।

15 नवम्बर 2000 को जयपाल का एक सपना पूरा होता है छोटा नागपुर में एक राज्य का गठन होता है नाम वही होता है ‘झारखंड’
परंतु अभी भी सपनो ने जो नियति के साथ वायदा किया था. वो अब भी अधूरे है. आदिवासियों का पूरा हक उन्हे नहीं मिला, उनकी आवाज आज भी दबी हुई है, फिर एक जयपाल की जरूरत है….
जय जोहार!